सीएए/एनआरसी- महत्वपूर्ण तथ्य

CAA और NRC- विस्तृत जानकारी

मेरे प्यारे देशवासियों ये मेरी एक छोटी सी कोशिश है CAA और NRC को लेकर फैले भ्रम को दूर करने की🙏… तमाम जानकारी एकत्रित करके आपके सम्मुख रख रही हूँ…पहले बात करते हैं CAA (Citizenship Amendment Act ) नागरिकता संशोधन कानून, 2019CAA में भारत के तीन पड़ोसी मुस्लिम देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान) से शरणार्थी बनकर 2014 तक भारत में आए अल्पसंख्यकों – हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी इन्हें नागरिकता देने की बात है.

याद रखिए इन्हें भारतीय नागरिकता तब मिलेगी जब वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लिए हों.ये लोग 6 साल ( 2014) से भारत में रह रहे हैं तो नागरिकता के लिए दावेदारी पेश कर सकते हैं वहीं अन्य लोगों के लिए यह अवधि 11 साल है. इसके बाद वह नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिस पर सरकार विचार कर फैसला लेगी.

CAA का किसी भी भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना नहीं है. इन तीनों देशों से आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देगा बस. भारत के किसी भी धर्म के नागरिक की नागरिकता नहीं छीनेगा.

अब बात करते हैं NRC (National Register of Citizen) राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की…सबसे पहले तो ये जान लें NRC सिर्फ़ और सिर्फ़ असम में आया है पूरे भारत में नहीं.असम के हालात पूरे भारत से अलग हैं (ये भी मैं नीचे बताऊंगी कैसे?)…. इसलिए वहां की NRC और पूरे भारत की NRC में जाहिर सी बात है फ़र्क होगा. लेकिन इतना तय है किसी भारतीय नागरिक को डरने की जरूरत नहीं घुसपैठिए डरें तो डरें उन्हीं को पकड़ने के लिए और अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए ये सब क़ानून आ रहे है 😀नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 में अवैध प्रवासी उन्हें माना गया है जो गैर-पासपोर्ट के भारत में प्रवेश करता है या फिर स्वीकृत समय से ज्यादा दिनों बाद भी भारत में रहता है.
NRC में भारतीय नागरिकों का लेखा-जोखा दर्ज होता है.NRC को पूरे देश में पहली और आखिरी बार 1951 में तैयार किया गया था.लेकिन इसके बाद इसे update नहीं किया गया था.असम में NRC… (कैसे, कब आई और जिनका नाम नहीं है nrc में उनका आगे क्या होगा?)असम में बाहरी बनाम असमिया के मसले पर आन्दोलनों का दौर काफी पुराना है.

50 के दशक से ही बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनैतिक मुद्दा बनने लगा था. औपनिवेशिक काल में बिहार और बंगाल से चाय-बागानों में काम करने के लिए बड़ी तादाद में मजदूर असम पहुँचे. अंग्रेजों ने उन्हें यहाँ खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. इसके अलावा विभाजन के बाद नए बने पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के साथ, असम में भी बड़ी संख्या में बंगाली लोग आये. तब से ही वहाँ रह-रह कर बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे पर चिंगारी सुलगती रही. लेकिन 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में मुसलमान बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की हिंसक कार्रवाई शुरू हुई तो वहाँ के तकरीबन 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली.

बांग्लादेश बनने के बाद इनमें से ज्यादातर लोग लौट गए, लेकिन तकरीबन 1 लाख असम में ही रह गए. 1971 के बाद भी कई बंगलादेशी असम आते रहे. जल्द ही स्थानीय लोगों को लगने लगा कि बाहर से आये लोग उनके संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेंगे और इस तरह जनसंख्या में हो रहे इन बदलावों ने असम के मूल निवासियों में भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी.वहां आंदोलन छिड़ गए.1983 के हिंसा के बाद समझौते के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई.

आखिरकार अगस्त 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आन्दोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे असम समझौते (Assam Accord) के नाम से जाना जाता है.असम समझौते के तहत 1951 से 1961 के बीच असम आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फैसला हुआ. 1971 के बाद असम में आये लोगों को वापस भेजने पर सहमति बनी. 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता और दूसरे अधिकार जरुर दिए गए लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं दिया.

2005 में एक बार फिर असम में आन्दोलन तेज हुआ. राज्य में कांग्रेस सरकार ने दबाव में आकर काम शुरू तो किया लेकिन कार्रवाई बेहद सुस्त रही. इस बीच पूर्वी बंगाल के मूल लोगों को संदिग्ध वोटर होने के आरोप में प्रताड़ित किये जाने की खबरें आती रहीं जिनमें बंगाली हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल हैं.

आखिरकार 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा.जब यह मामला 2013 में सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2014 में आदेश दिया कि NRC के updation का काम 31 जनवरी, 2016 तक पूरा हो जाना चाहिए. मगर NRC authority इस आदेश का अनुपालन नहीं कर पाई और उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया पर निगाह रखे हुए है और उसी के निगरानी में NRC के updation का काम चल रहता रहा .2013 से 2017 तक के चार साल के दौरान असम के नागरिकों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कुल 40 सुनवाइयां हुईं, जिसके बाद नवंबर 2017 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि 31 दिसंबर 2017 तक वो एनआरसी को अपडेट कर देंगे. हालांकि बाद में इसमें और वक्त की मांग की गई.

फिलहाल 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और असम सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की फाइनल लिस्ट 31 अगस्त 2019 में जारी कर दी है. इस लिस्ट में 19 लाख लोग अपनी जगह नहीं बना पाए. जिन लोगों के नाम लिस्ट में नहीं थे, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो करोड़ दावों का पहला draft जारी करने का निर्देश दिया था.कोर्ट ने जांच में करीब 38 लाख लोगों के दस्तावेज संदिग्ध पाए थे.

कौन है असम का असली नागरिक? 1951 में जिन लोगों के नाम NRC में थे उनके संतानों के नाम NRC के updated list में शामिल किये गए.असम और पश्चिम बंगाल राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में कथित बांग्लादेशियों और मूल निवासियों की पहचान एक मुश्किल काम है. इन इलाकों में सीमा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों का रहन-सहन और भाषा एक जैसी है. ऐसे में कई बार स्थानीय लोगों को भी पुख्ता कागजात दिखाकर अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ती है. इन इलाकों में बांग्लादेशी और भारतीयों का भेद कर पाना कठिन है. इसे लेकर तमाम तरह की राजनीति होती है.असम में लाखों लोगो को यह साबित करना था कि उनके माता-पिता 24 मार्च, 1971 में बांग्लादेश बनने से पहले ही असम में आकर रहने लगे थे.

यदि legacy data में किसी को अपना नाम नहीं मिला तो इसके लिए विशेष प्रबंध किए गए . 24 मार्च, 1971 से पहले के मतदाता सूची, जमीन के कागजाद, नागरिकता प्रमाण पत्र, शरणार्थी पंजीकरण प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, LIC policy, सरकार की तरफ से जारी कोई licence या प्रमाण पत्र, सरकारी नौकरी के दस्तावेज, बैंक या पोस्ट ऑफिस में खाते, जन्म प्रमाण पत्र, शिक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय के सर्टिफिकेट और अदालत के दस्तावेजों को legacy data के लिए मान्य करार दिया गया है.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि NRC लिस्ट में जगह न पाने का यह अर्थ नहीं होगा कि ऐसे लोगों को विदेशी घोषित कर दिया जाएगा. ऐसे लोगों को फॉरेन ट्राइब्यूनल के समक्ष अपना केस पेश करना होगा. फैसला आने तक उन्हें छूट दी जाएगी.असम समझौते के मुताबिक फॉरेन ट्राइब्यूनल्स अर्ध न्यायिक संस्थाएं है, जिसे सिर्फ नागरिकता से जुड़े मसलों की सुनवाई का अधिकार दिया गया है. ट्राइब्यूल्स की ओर से विदेशी घोषित किए जाने के बाद किसी भी शख्स को NRC में जगह नहीं दी जाएगी. इसके अलावा यदि किसी शख्स को लिस्ट में जगह मिलती और ट्राइब्यूनल से उसकी नागरिकता खारिज होती है तो फिर ट्राइब्यूनल का आदेश ही मान्य होगा.

असम के मुख्यमंत्री ने पहले ही बताया था कि गलत ढंग से लिस्ट में शामिल हुए विदेशी लोगों और बाहर हुए भारतीयों को लेकर केंद्र सरकार कोई विधेयक भी ला सकती है. शेड्यूल ऑफ सिटिजनशिप के सेक्शन 8 के मुताबिक लोग NRC में नाम न होने पर अपील कर सकते हैं. अपील के लिए समयसीमा 31 दिसंबर, 2019 थी. गृह मंत्रालय के आदेश के तहत 400 ट्राइब्यूनल्स का गठन NRC के विवादों के निपटारे के लिए किया गया. यदि कोई व्यक्ति ट्राइब्यूनल में केस हार जाता है तो फिर उसके पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प होगा. असम सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई परिवार गरीब है और कानूनी जंग नहीं लड़ सकता है तो उसे मदद दी जाएगी.

उम्मीद है यह जानकारी आपके लिए उपयोगी होगी🙏😊

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