सीएए/एनआरसी- महत्वपूर्ण तथ्य, हम हिंदुस्तानी

शरणार्थी हिंदू भाइयों का क्या दोष ??

भारत विभाजन से पहले मुसलमानों की संख्या भारत की कुल आबादी का 10 प्रतिशत थी, जो आज बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत हो गई है।

आज़ादी के वक्त पाकिस्तान में कुल 428 मंदिर थे, जिनमें से अब सिर्फ 26 ही बचे हैं।

माइनॉरिटी राइट ग्रुप इंटरनेशनल के मुताबिक 2-8 दिसंबर, 1992 के दौरान पाकिस्तान में तकरीबन 120 हिन्दू मंदिरों को गिराया गया।

पाकिस्तान के नेशनल कमिशन फॉर जस्टिस एंड पीस की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक 74 प्रतिशत हिन्दू महिलाएं यौन शोषण का शिकार होती हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की वर्ष 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में हर महीने 20 से 25 हिन्दू लड़कियों का अपहरण होता है और ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया जाता है।

जब पाकिस्तान में जीने के लिए अनुकूल स्थिति नहीं रही तो मजबूरन हिन्दुओं को बड़ी संख्या में पाकिस्तान छोड़ना पड़ रहा है। पाकिस्तान की जनगणना (1951) के मुताबिक पाकिस्तान की कुल आबादी में 22 फीसदी हिन्दू थे, जो 1998 की जनगणना में घटकर 1.6 फीसदी रह गए हैं। ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1965 से लेकर अब तक तकरीबन सवा लाख पाकिस्तानी हिन्दुओं ने भारत की तरफ पलायन किया है।

वैसे, जब पाकिस्तान में मुस्लिम ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हिन्दुओं के लिए शिकायत कहां करें…? वहां मंदिरों में ही नहीं, मस्जिदों में भी धमाके होते रहते हैं। शियाओं और सुन्नियों के बीच आए दिन दंगे होते हैं, सो, ऐसे में हिन्दुओं के मानवाधिकारों की बात करना मूर्खतापूर्ण लगता है।

भारत आए इन परिवारों को अभी तक किसी राजनैतिक दल से कोई सहारा नहीं मिला है। उनका दोष इतना है कि वे भारत आकर अल्पसंख्यकों के गणित से बाहर हो जाते हैं। किसी पार्टी का वोट बैंक नहीं बन पाते। इन लोगों को पाकिस्तान में अल्पसंख्यक होने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा और भारत में बहुसंख्यक होने की वजह से राजनैतिक दलों की उदासीनता झेलनी पड़ रही है। मोटे तौर पर मीडिया भी उन्हें नज़रअंदाज़ करती रही है।

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