हम हिंदुस्तानी

ऐ! मेरे वतन के लोगों

ऐ! मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी, इतनी जल्दी कैसे तुम भूले कश्मीर की वो दर्द भरी कहानी…

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कश्मीर में हिंदुओं पर कहर टूटने का सिलसिला 1989 जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लाम ने शुरू किया था।
14 सितंबर 1989 को भाजपा के नेता पंडित टीका लाल टपलू को कई लोगों के सामने मार दिया गया. हत्यारे पकड़ में नहीं आए. ये कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाने को लेकर पहली हत्या थी. इसके डेढ़ महीने बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या की गई. गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी. गंजू की पत्नी को किडनैप कर लिया गया. वो कभी नहीं मिलीं. वकील प्रेमनाथ भट को मार दिया गया. 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या की गई.ये तो बड़े लोग थे. साधारण लोगों की हत्या की गिनती ही नहीं थी. इसी दौरान जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किये गये थे. क्यों? इसका जवाब नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने कभी नहीं दिया.

4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा. चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित कश्मीर से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा. इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे. कहते कि पंडितो, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ, – “असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए. पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ.) गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ. फिर मार दिया गया. ऐसी ही अनेक घटनाएं हुईं. पर उनका रिकॉर्ड नहीं रहा ये बस किस्सों में रह गईं.
मस्जिदों में भारत एवं हिंदू विरोधी भाषण दिए जाने लगे। सभी कश्मीरियों को कहा गया की इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाएं. कश्मीर में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया. उसने नारा दिया हम सब एक हैं तुम भागो या मारो. कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया, जिसमें लिखा था ‘या तो मुस्लिम बन जाओ या कश्मीर छोड़ दो’.इस दौरान 350 से अधिक हिंदू-महिलाओँ और पुरुषों की हत्या कर दी गई. बड़ी संख्या में मंदिर तोड़े गए . सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए हालात बदतर हो गए. धीरे-धीरे कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी. 19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर छोड़ा था. लगभग 4 लाख लोग विस्थापित हुए थे. करोड़ों के मालिक कश्मीरी पंडित अपनी पुश्तैनी जमीन जायदाद छोड़कर रिफ्यूजी कैंपों में रहने को मजबूर हो गए.

समझ सकते हैं आप उनकी पीड़ा, जब आपके अपने लोग,अपने देश से, आपको अपने घरों से भाग जाने को निर्ममता पूर्वक मजबूर करते हैं? कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को सेक्युलर रहने और देश में समरसता लाने के नाम पर बहा दिया गया. आज भी ज़्यादातर मंदिर बंद हैं. पिछले 30 सालों में किसी भी सरकार ने ऐसा माहौल तैयार नहीं किया है जिससे कश्मीर में उनकी वापसी हो सके.हालांकि केंद सरकार इनके पुनः स्थापन की ओर कदम बढ़ा रही हैं. पूरे कश्मीर में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 50 हजार मंदिर हैं जो बंद पड़े हैं ये बहुत ही जीर्ण हाल में है इन्हें सर्वेक्षण के बाद केंद्र सरकार ने पुनः खोलने का निर्णय लिया है.

 

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