दिल है हिंदुस्तानी

हमारी संस्कृति हमारी पहचान

2011 की बात है मैं जर्मनी गई थी। बहुत ही शांतिप्रिय और सुंदर, साफ़ सुथरा देश। कसेल (kassel) जर्मनी का एक छोटा सा टाउन हालांकि वहां के टाउन में जो सुविधाएं और साफ़ सफाई थी कहते हुए भी बड़ा संकोच होता है उसकी तुलना भी हम अपने देश की राजधानी दिल्ली से नहीं कर सकते; जहां बेइंतिहा ट्रैफिक और प्रदूषण के सिवाय दूर तक कुछ नहीं दिखता। क्योंकि ये छोटी जगह थी टूरिस्ट ज़्यादा आते नहीं थे इस वज़ह से कुछ एक लोग हमें थोड़ा घूर के देखते फ़िर बड़ी सी स्माइल उछाल देते। तभी किसी ने पूछा, “आप कहाँ से हो?” मैंने बड़ा चहकते हुए कहा, “इंडिया!”ऐसा लगा जैसे उसने न जाने कौन से ग्रह का नाम सुन लिया हो।”इंदिया…?” ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था वो।
मुझे बड़ा अज़ीब लगा इतने पढ़े लिखे, विकसित लोग हैं इंडिया का नाम भी नहीं सुना? भूगोल तो पढ़ा होगा?तभी वो मुस्करा के बोलता है, “बांग्लादेश?”मैं हैरान थी।अपने भारत में बैठे बैठे बड़ा नाज़ था इसपर कि हमारी विभिन्नता की, एकता की बड़ी चर्चा होगी दुनिया में यही तो सिखाया जाता है हमें बचपन से मगर आज हक़ीक़त के एक तमाचे ने सारे वहम की दीवार गिरा दी थी।इतने सुंदर और अद्भुत वातावरण में भी मैं बड़ा बेगाना और दूसरे ग्रह से आई प्राणी समझ रही थी ख़ुद को; इस वजह से मैं थोड़ा गुमसुम थी।तभी एक दूसरे जर्मन सज्जन होठों पर बड़ी सी हंसी का नज़राना लेकर आए।पास बैठे पूछा, “कहाँ से हैं आप लोग?”क्योंकि वहम पहले ही धराशाही हो चुका था इसलिए बताने में अबकी थोड़ी असहजता हुई, धीरे से निरुत्साहित होकर मैं बोली, “इंडिया…”इंडिया सुनते ही वो मुस्करा उठा, “रामदेव!” मैं आश्चर्यचकित सी उसे तकती रह गई। उसने बताया वो जानता है रामदेव जी को और योगा भी करता है।
अब जाकर सीना थोड़ा चौड़ा हुआ। आगे सहजता से बात-चीत हुई। वो इंडिया के बारे में और जानना चाहता था। उस दिन अपने देश की प्राचीन विरासत और सनातन संस्कृति ने ही मुझे विदेश में पहचान दिलवाई।जय हिंद