इतिहास के गलियारे से

आपातकाल देश के लोकतंत्र पर एक काला धब्बा

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25 जून 1975 आज से तकरीबन 44 साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा की थी।  दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के संविधान में दिए गए नागरिकों के मूलभूत अधिकार रातोंरात छीन लिए गए थे. विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

प्रेस की आजादी पर सरकारी पहरा लागू हो गया। देश के लोकतंत्र में यह काला दिन बनकर अंकित है। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक यानी 21 महीने की अवधि तक भारत में आपातकाल घोषित था। यह आपातकाल आजाद भारत के इतिहास की सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक है।

नेताओं की गिरफ्तरियां

 आपातकाल की घोषणा के साथ ही सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया, अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं रह गया।

 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया।

उन्हें कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी नहीं दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत मिले अधिकारों का इंदिरा गांधी ने गलत प्रयोग किया। जय प्रकाश, जॉर्ज फर्नांडिस, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, सुब्रमण्यम स्वामी, अटल बिहारी वायपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, रामकृष्ण हेगड़े, एचडी देवेगौड़ा, एम करुणानिधि, जेबी पटनायक, ज्योति बसु, मधु दंडवते, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे नेताओं को जेल में डाल दिया गया। जेलों में जगह नहीं बची। आपातकाल के बाद प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न कहानियां सामने आई। प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो सकती थी।

एक अजब सा माहौल था। पुलिस जिसको चाहती थी पकड़ लेती थी। एफआइआर की छपी-छपाई प्रति पुलिस के पास रहती थी जिस पर केवल नाम और पता भरने के साथ ही अपराध के किसी बिंदु पर टिक लगा देना होता था। अभिव्यक्ति के सभी स्नोतों पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद भूमिगत गतिविधियां जारी रहीं जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

संजय गांधी की एंट्री

नसबंदी का फैसला इंदिरा सरकार ने जरूर लिया था लेकिन इसे लागू कराने का जिम्मा उनके छोटे बेटे संजय गांधी को दिया गया. स्वभाव से सख्त और फैसले लेने में फायरब्रांड कहे जाने वाले संजय गांधी के लिए यह मौका एक लॉन्च पैड की तरह था. इससे पहले संजय को राजनीतिक रूप से उतना बड़ा कद हासिल नहीं था लेकिन नसबंदी को लागू करने के लिए जैसी सख्ती उन्होंने दिखाई उससे देश के कोने-कोने में उनकी चर्चा होने लगी.

आजादी के बाद जनसंख्या विस्फोट से निपटना कांग्रेस सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी. अमेरिका जैसे कई अन्य मुल्कों का मानना था कि भारत कितना भी उत्पादन क्यों न कर ले लेकिन विशाल जनसंख्या का पेट भरना उसके बस में नहीं. वैश्विक दबाव और परिवार नियोजन के अन्य फॉर्मूले फेल साबित होने पर आपातकाल ने नसबंदी को लागू करने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया. लेकिन इस फैसले के पीछे संजय गांधी की महत्वाकांक्षा भी थी क्योंकि उन्हें खुद को कम वक्त में साबित करना था.

यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई। आपातकाल 1977 में 21 मार्च को हटाया गया। यह आपातकाल आजाद भारत के इतिहास की सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक है।

आपातकाल से पहले इसकी पृष्ठभूमि और घटनाक्रम बड़ा लंबा रहा है. लेकिन इसकी घोषणा के करीब 13 दिन पहले क्या-क्या हुआ था इसको जानना भी जरूरी है.

आपातकाल से जुड़ीं 7 अहम बातें

  1. 12 जून, 1975:  इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली में हुए चुनाव के दौरान की गई गड़बड़ी का दोषी पाया और छह साल के लिए पद से बेदखल कर दिया. जनता पार्टी के नेता राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में चुनाव में हारने के बाद अदालत में शिकायत की थी.
  2. 24 जून, 1975: इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहां भी इंदिरा गांधी को झटका लगा और फैसले को बरकरार रखा लेकिन साथ ही  इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की इजाजत दे दी गई.
  3. 25 जून, 1975: कांग्रेस के नेता रहे जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन की शुरुआत की जिसे ‘संपूर्ण क्रांति’ कहा गया और देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए.
  4. 25 जून, 1975: राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने  प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई.  संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रधानमंत्री की सलाह पर वह हर छह महीने बाद 1977 तक आपातकाल की अवधि बढ़ाते रहे.
  5. सितंबर, 1976: अनिवार्य पुरुष नसबंदी की गई. लोगों को इससे बचने के लिए लंबे समय तक छिपने पर मजबूर होना पड़ा.
  6. 18 जनवरी, 1977: इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दिया और मार्च में आम चुनाव की घोषणा की. सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया.
  7. 23 मार्च, 1977: आपातकाल समाप्त हो गया.

आज हम राजनीति में जिन ज्यादातर बड़े चेहरों को देखते हैं वह आपातकाल के समय ही में आए थे. करीब 21 महीने तक देश में आपातकाल लागू रहा था और लेकिन इसके ठीक बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी और देश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार बनी थी.

आपातकाल और पीएम मोदी

आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहम भूमिका निभाई थी। आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता छीनी जा चुकी थी। कई पत्रकारों को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकार की कोशिश थी कि लोगों तक सही जानकारी नहीं पहुंचे। उस कठिन समय में नरेंद्र मोदी और आरएसएस के कुछ प्रचारकों ने सूचना के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी उठा ली। इसके लिए उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया। संविधान, कानून, कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के बारे में जानकारी देने वाले साहित्य गुजरात से दूसरे राज्यों के लिए जाने वाली ट्रेनों में रखे गए। यह एक जोखिम भरा काम था क्योंकि रेलवे पुलिस बल को संदिग्ध लोगों को गोली मारने का निर्देश दिया गया था। लेकिन नरेंद्र मोदी और अन्य प्रचारकों द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीक कारगर रही।

शाह कमीशन की रिपोर्ट
भारत सरकार ने 1977 में आपातकाल के दौरान किए गए अत्याचारों की पड़ताल करने के लिए शाह कमीशन का गठन किया। इस कमीशन की रिपोर्ट में सामने आया कि आंतरिक सुरक्षा बहाली अधिनियम और भारतीय सुरक्षा नियमों के तहत 1,10,806 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया।

स्वार्थ के आगे लोकतंत्र धराशायी

आपातकाल लगाते वक्त इंदिरा गांधी ने कहा था कि खराब आर्थिक स्थिति और आंतरिक और बाहरी खतरों से देश को बचाने के लिए आपातकाल लगाया जा रहा है। लेकिन सच तो यह है कि भारत नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी खुद खतरे में थीं, इसलिए उन्होंने आपातकाल का रास्ता चुना। अपने निजी स्वार्थ की रक्षा के लिए उन्होंने लोकतंत्र का हनन किया।

आपातकाल का इतिहास

आपातकाल ऐसी अवधि होती है जिसमें सत्ता की पूरी कमान प्रधानमंत्री के हाथ में आ जाती है। अगर राष्ट्रपति को लगता है कि देश को आंतरिक, बाहरी या आर्थिक खतरा हो सकता है तो वह आपातकाल लागू कर सकता है। अब तक देश में तीन बार आपातकाल लागू हुआ है।

  • 26 अक्टूबर, 1962 से 10 जनवरी, 1968 तक : भारत- चीन युद्ध
  • 3 दिसंबर, 1971 से 21 मार्च 1977: पाकिस्तान से युद्ध
  • 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 : इंदिरा गांधी ने निजी स्वार्थ साधने को आपातकाल लगाया।

2 thoughts on “आपातकाल देश के लोकतंत्र पर एक काला धब्बा”

  1. जानकारी थी मुझे इसकी पर इतनी विस्तृत जानकारी न थी। इस पोस्ट के लिए बहोत धन्यवाद आपका। आगे और भी अच्छे पोस्ट की आकांक्षा करता हूँ।

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