प्रकाशित लेख

स्त्री पुरुष के मध्य संतुलन जरूरी है

आज दिनांक 03.02.2020 को समाचार पत्र उजागर संसार के संपादकीय में मेरा लेख “स्त्री पुरुष के मध्य संतुलन जरूरी है” प्रकाशित हुआ है। लेख नीचे लिख रही हूं…

“जब सृष्टि की रचना हुई। स्त्रियों को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई… जननी की, अजन्में शिशु को कोख में रखकर अपने लहू से सींचकर तमाम पीड़ा उठाने के बाद वो उसे जन्म देती है। पालन-पोषण करती है। इस स्त्री की सुरक्षा के लिए पुरुषों को बनाया उन्हें शक्ति प्रदान की।उन्हें रक्षक बनाया।
प्रकृति का नियम है हर जीवित रचना में मादा ही बच्चे को जन्म देती है नर नहीं। नवजात को जन्म देने, उनके पालन-पोषण हेतु सब तकलीफें उठाने के लिए कोमल, निष्काम भावनाएं चाहिए। इसलिए स्त्री मन से सदैव कोमल और भावनाओं की धनी रही।
पुरुषों की ज़िम्मेदारी रही उन्हें भोजन और सुरक्षा प्रदान करवाना। लेकिन धीरे-धीरे पुरुषों ने जो शारीरिक रूप से महिलाओं से ज़्यादा बलिशाली थे क्योंकि वो स्त्रियों के रक्षक थे इसलिए होना भी था, वे बाहर निकलकर आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाने लगे, घर-परिवार चलाने की ज़िम्मेदारी स्त्रियों की रही।
समय गुज़रता रहा गुज़रते समय के साथ पुरुषों में छल आने लगा वो आर्थिक रूप से मजबूत हुए तो स्त्रियों का शोषण करने लगे। कुछ तो उन्हें दास समझने लगे। जब सब कुछ बर्दाश्त करना स्त्री की सहनशक्ति के बाहर हो गया उसने भी आर्थिक स्थिरता और दूसरों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से घर की चार दीवारी से बाहर क़दम निकाले।
उसकी सुरक्षा का घेरा अपने आप कम हो गया। वो पुरुष जो अपने घर बैठी स्त्री को ही कुछ नहीं समझता था लेकिन नाम के लिए उनका रक्षक था दूसरी स्रियों के लिए भक्षक बन बैठा। स्त्री जाति जो उनकी जननी भी है को मात्र भोग की वस्तु बना दिया। स्रियों को सदियों से मुनासिब सम्मान न मिलने और शोषण होने से अब संतुलन बहुत गड़बड़ा गया है।
अगर स्रियों को उचित सम्मान न मिला पुरुषों का उनकी ओर देखने का नज़रिया न बदला तो संतुलन और बिगड़ेगा और एकदिन प्रलय आकर ही पुनः संतुलन स्थापित करेगी। इसकी ज़िम्मेदार समूची मानव जाति होगी।
स्त्री-पुरुष दोनों के अपने-अपने गुण, साथ ही कुछ उत्तरदायित्व भी हैं हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए, दोनों के बराबर महत्व को समझना चाहिए ये संतुलन बना रहना चाहिए तभी सबकी उन्नति है।”
©®कुसुम गोस्वामी

26 thoughts on “स्त्री पुरुष के मध्य संतुलन जरूरी है”

    1. सचमुच पोस्ट बहोत अच्छी है, मेरा भी कुछ मार्गदर्शन करिए 🙏

    2. वो तो हमें नहीं पता🙏 आप कुछ मार्गदर्शन करिए कि लेखनी में सुधार हो मेरे और कुछ प्लेटफार्म मिले 🙏

  1. लेख प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई

    लोग कहते हैं कि स्त्री और पुरुष जीवन की गाड़ी के दो पहिए है लेकिन मेरा मानना है कि यह रिश्ता हृदय और खून जैसा है जहां किसी एक के खराब होने पर जीवन संभव नहीं होता। परस्पर सहचर्य पर आधारित यह संबंध अब एक ऐसे दौर में है जहां पुरानी परिभाषाओं से इतर एक नई परिभाषा गढ़ने की उत्कंठा बहुत जोरों पर है।

    1. तहेदिल से शुक्रिया आपका। बदलते परिवेश में हर चीज़ बदल रही है आदमी का स्वभाव उसकी जरूरतें सब बदल रहे हैं जिम्मेदारियां और बढ़ रही हैं। एकल परिवार हो या संयुक्त, परिवार को समय देना अतिमहत्वपूर्ण हैं। अगर समय देते हैं तो हम अलग अलग विचारधारा के होते हुए भी अपनी बात दूसरे को समझा पाएंगे। और इस तरह एक दोस्ताना रिश्ता दोनों के मध्य बना रहेगा। जो उनके रिश्ते को नई स्फूर्ति प्रदान करेगा।

  2. यदि आदर्श से बाहर झांके तो कुछ चीज स्पष्ट होगी। यदि स्त्री पुरुष की माता नहीं होती तब सोचिए पुरुष स्त्री का क्या हाल करता है मेरा तो कथन है उसे बाड़े में रखता।
    ऋग्वेद में इंद्राणी कहती है मैं अबला नहीं मैं सबला हू मैं वीर पुरुषों की जननी हूँ।
    एक बात और नास्ति मात्र समो गुरु अर्थात माता के समान कोई गुरु नहीं है माता को ही प्रथम गुरु कहा जाता है।
    अब वह पुरुष जो स्त्री के रक्त,हांड,मांस से बना है उसका शोषण कैसे कर सकता है? माता उसको नारी का सम्मान करना क्यों नहीं सिखा पाती ,कहा कमी रह जाती है।
    सकारात्मक संदर्भ में लीजिएगा

    1. क्योंकि माता ख़ुद सम्मान नहीं पाती। वो दास की तरह जीवन जीती आई तो वही एकदिन उसका बेटा भी सीखता है।
      माँ के आंचल से जैसे ही बाहर निकलता है एक अलग संसार पाता है।
      एक बच्चे के मानसिक विकास में सिर्फ़ परिवार नहीं समाज भी भूमिका निभाता है। इसलिए समाज को नज़रिया बदलने की जरूरत है😊

    2. समाज व्यक्ति से बनता है समाज से व्यक्ति नहीं बनता है। माँ को दास कह कर आपने पूरी भारतीय संस्कृति को बंधन में कर दिया। यदि मां के मनोभाव को मान भी लिया जाय तो आपके अनुसार वह दास जीवन जीती है तब तो कुंठित हो जाएगी और इसी कुंठा में अपने बच्चे का पालन करेगी जिसका कुंठित संस्कार उसके बच्चे पर आयेगा और फिर वह अपनी पत्नी को इसके लिए विवश करेगा।
      इसे ही नकारात्मक विचार कहते है जो आधुनिक वामपंथी शिक्षा से उपजे है। इस धरती पर एक स्त्री को जितना प्रेम,सम्मान उसका पति दे देता वह उसे कही नहीं मिलता। व्यक्तिपेक्षित दृष्टिकोण से बाहर आकर अपने आसपास से शुरुआत कर सकती है स्वयं के खट्टे मीठे जीवन से समाज का जनमत नहीं बनाया जा सकता।

    3. आप जिस समाज का जिक्र कर रहे हैं वो आदर्श समाज है। मैं हिन्दू होने पर गर्व करती हूं। लेकिन हमारे समाज में जो कमियां है उन्हें हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
      सतीप्रथा, दहेज हत्या, बलात्कार, गर्भहत्या फिर ये क्या हैं?
      ये मेरे अनुभव से नहीं हुए या आज भी नहीं हो रहे ये सत्य हैं। भयानक सत्य जिनसे मुंह मोड़कर नहीं सामना कर के इन्हें विदा करने होगा

    4. सती प्रथा आप ने देखी नहीं होगी,दहेज के हत्या अब बन्द हो चुकी है अब तो सास ससुर अपनी खैर मनाएं वही बड़ी बात। बलात्कार का राक्षस जरूर है। गर्भ हत्या के पुरुष के बराबर महिला दोषी भी दोषी है उसे बेटा का सम्बोधन यह पुरुष वस्त्रो से खुश क्यों होती है नारी पुरुष बनाना चाहती है इसके लिए भी समाज दोषी है स्थितियां अब बदल चुकी है जिसका व्यवहार में अध्धयन करके देख सकती है। दहेज की पूरी फिलोसोफी बतानी पड़ेगी उसकी भी हकीकत सामने होगी।

    5. देखिए हर स्त्री की स्थिति एक जैसी नहीं है। बदलाव और सुधार हुए हैं यही मैं बता रही हूँ।
      लेकिन आपसे पूछना चाहती हूं क्या आज भारत में स्त्रियों का दर्जा अपने सर्वोच्च पर है?

    6. स्त्री सुरक्षा और परिवार की कुल,वंश परम्परा ऐसी चीज है पुरुष के चरित्रहीन होने पर भी उसके वंश का वचाव हो सकता है वही दूसरे के घर से मेरी पत्नी जो मेरे कुल,वंश को धारित करती है इसे लिए इसे धात्री भी कहा जाता है। स्त्री किसी दर्जे के अधीन नहीं है यदि वही कमजोर हो गयी तो परिवार,विवाह नामक संस्थाये खत्म हो जाएंगी। पुरुष को फिर किसी भी तरह निगमित नहीं किया जा सकेगा। स्त्री की तुलना जो पुरुष से होती है वह गलत है स्त्री स्वतंत्रत चेतना है उसी पश्चिमी विचार पुरुष की नकल बनाने का प्रयास क्यों किया जाता है यह समझ नहीं आता है।

    7. कुसुम जी स्त्री विमर्श पर तस्लीमा नसरीन बहुत अच्छा लिखी है जो मूल्यपरक भी है

    8. सकारात्मक सुधार परिवर्तन लाते है बाकी नकारात्मक विकास की होड़ चल रही है दूसरे को नीचा दिखाने की बर्दास्त करने वाली चीजें भैतिकता में खोती जा रही। मैं और मेरा तोर तो माया। सिर्फ अहमकेन्द्रिता ।। जिससे निकले बिना मनुष्यता का विकास नहीं होगा

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