दिल है हिंदुस्तानी

लॉक डाउन

जिनसे अपना घर नहीं चलता वह देश चलाने की सलाह देते हैं
कुछ लोगों का कहना है लॉक डाउन बहुत जल्दी में लिया गया जबकि जल्दी नहीं लेना फायदेमंद था। क्षणिक परेशानी या जीवनरक्षा किसे चुनेंगे आप
जरा सोचिए सरकार आज अनाउंस करें कि 2 दिन बाद लॉक डाउन हो रहा है तो क्या हाल होगा 130 करोड़ आबादी वाले देश का…
ज्यादातर लोग रोजी रोटी की तलाश में बड़े-बड़े शहरों में रहते हैं वो हर हाल में ट्रेनों में भर-भरकर अपने गांव जाने लगेंगे। और ट्रेन भी कितनी हैं? दो दिन में हर नागरिक को घर नहीं पहुंचा सकतीं। यहाँ दो महीने पहले भी कंफर्म टिकट नहीं मिलता।
वहीं शहरी मध्यम वर्गीय लोग किरानों की दुकानों में लगकर पूरा राशन खाली कर देंगे। थैली और अपने कपड़ों में कोरोना भरभरकर लाएँगे।
पूरे देश में अफरा-तफरी मच जाएगी, लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा मतलब खत्म। लॉक डाउन का मतलब जो जहां है वही रहे।
अरे! आपातकाल है कोई गर्मी की छुट्टी थोड़ी ना जो बता कर दी जाएगी। मुसीबत बता कर थोड़ी ना आई थी जो आपको प्लानिंग करके घर छोड़कर आते।
संक्रमित लोग अपने साथ कोरोना भी गाँव ले जाएंगे।
वहां ठीक से अस्पताल नहीं, खेती-बाड़ी भी बंद, तब पूरा भारत भूख से मरेगा। इसलिए जज्बातों की जगह सरकार ने दिमाग से काम लिया।
पूरी दुनिया जिसकी प्रशंसा कर रही है वहीं उसके देश के जाहिल मतलब तथाकथित बुद्दिजीवी कमी निकाल रहे हैं।
मोदी जी लगातार कह रहे थे जो जहां है वहीं रहे हम उसके खाने-पीने का अरेंजमेंट करेंगे कोई भूखा नहीं रहेगा पर इतने विशाल देश के लिए व्यवस्था करने में थोड़ा समय लगता है।
भारत सबसे पहले एयरपोर्ट पर कोरोना टेस्ट करवा रहा था। जनता कर्फ्यु तक भारत में मात्र 374 केस थे।
भारत में जहां लंगर, भंडारे चलते हैं वहां भूख से तो कोई नहीं मरने वाला। हाँ! हालात बेकाबू हुए तो लाशों का पहाड़ बन जाएगा।
इसलिए हम मोदी जी के इस फैसले की सराहना करते हैं यह जानते हुए कि इससे लोगों को परेशानी कम उनको गाली ज्यादा खानी पड़ेगी, देशहित और अपने तमाम मूर्ख देशवासियों के बारे में सोचा।
 
©®कुसुम गोस्वामी