इतिहास के गलियारे से

सब धर्म समान ?

हर धर्म, संस्था, राजनीतिक पार्टी किसी ना किसी विचारधारा पर आधारित होती है। जिसमें शामिल लोगों की एक विचारधारा होती है। जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाई जाती है।
दरअसल हम किसी व्यक्ति विशेष का नहीं उस विचारधारा का विरोध करते हैं जो हमें ग़लत या पक्षपात से भरी लगती है।
हर धर्म समान नहीं है सबकी अपनी मान्यताएं हैं।
हम सबको समान मान भी लें पर जिस विचारधारा का आधार ही ख़ुद को श्रेष्ठ मानना ही नहीं अपितु दूसरे के विनाश को जन्नत जाने का मार्ग बतलाए तो उसके साथ हमारा टकराव स्वाभाविक है जो होता भी रहा है।
इसलिए तब तक सब धर्म समान नहीं हो सकते जब तक सबकी मान्यताएं समान न हों। या कम से कम दूसरों को समान सम्मान न दें।
एक खास मज़हब में सदियों से नफ़रत परोसी जाती रही है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। पर सच पर पर्दा डालने वालों को ये समझ नहीं आएगा या समझ कर भोले बने रहेंगे।
समाज में ऐसी गलत नीतियों  का विरोध अति आवश्यक है नहीं तो वे बढ़ती जाती हैं और अपने साथ साथ दूसरों के सर्वनाश का कारण बनती हैं।
जानते तो हम भी है कि खून का रंग सबके लाल होता है। पर फ़र्क उनमें बहती व दिमाग में पलती विचारधारा और संस्कारों का है। ऐसी राक्षसी मानसिकता का विरोध बुराई नहीं बल्कि अच्छाई को जन्म देता है।

कुसुम गोस्वामी

7 thoughts on “सब धर्म समान ?”

  1. Jis dharm ya vichardhara men manav kalyan aur sabko ek samaan nahi manta wah dharm hai hi nahi…….kyun log usey dharm kahte rahe…….yahi sabse bada adharm hai aur nischit hi uska ek din mit jaanaa hota hai………haa abhi usse insan jarur kasht paate hain.

    1. जी हां, आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं। यह धर्म न होकर सिर्फ एक मजहब है।

  2. इस मामले में खुलकर बोलना हमारे लिए मुश्किल।होता है और कहते है कि वो डरे हुए है.
    प्रथमतया तो उनका अल्पसंख्यक दर्जा निकालना पड़ेगा. वो माइनॉरिटी नहीं, सेकंड मेजोरिटी है.
    द्वितीय, उनका पर्सनल लॉ और मस्जिदों-मदरसों में दी जानेवाली सारी सीख औऱ उसके चलते उनके आनेवाले समय के वहीं मनसूबे जो उन्होंने अफगानिस्तान,ईरान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, काश्मीर, केरल और बंगाल में हमारी आंखों के सामने यशस्वी किये है, सब कुछ बन्द करना पड़ेगा.
    और तीसरा, जब तक वो देश को उसकी संस्कृति के साथ अपना नहीं मानते तब तक न उनसे सेक्युलरिज़्म की अपेक्षा हो न हमसे सेक्युलरिज़्म की बात!

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