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मेघना- समीक्षा-1

मेघना की  समीक्षा : विशाल यादव जी द्वारा –

साहित्य में लोकरंजन अनिवार्य है क्योंकि हास्य और व्यंग्य के बिना साहित्य में पंच नहीं आ पाएगा और वह ऐसी पुस्तक बनकर रह जाएगी जो सिर्फ नियम कायदे सिखाती है। चूंकि पुस्तक का पढ़ा जाना और फिल्म का देखा जाना उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है इसलिए बिना लोकरंजन के यह असंभव है कि कोई पुस्तक पढ़ी जाए और फिल्म देखी जाए। यही कारण है कि हर साहित्य में कुछ ऐसे पात्र रचे जाते हैं जो लोकरंजन भी करते हैं। यूं समाज में यह लोकरंजन और लोकमंगल साथ साथ चलते हैं चाहे जितना धीर गंभीर मनुष्य क्यों ना हो उसमें भी हास्य का पुट रहता है। इसलिए साहित्य इसके इस पुट को भी उभारता है। एक ऐसी ही रोमांचित कर देने वाली साहित्यिक पुस्तक हमारे पास कुछ दिन पहले ही आई और उसके साथ ऐसा समरसता का संबंध हो गया कि प्रकट करना नामुमकिन हैं। उस पुस्तक का नाम “मेघना”, जिसकी रचनाकार कुसुम गोस्वामी मैम है। इस पुस्तक को लिखने में निश्चित तौर पर विचारधाराओं की सकारात्मक पराकाष्ठा होगी और इसको लिखने की लिए समाज, लोगों को समझने का ज्ञान और बौद्धिक क्षमता का एक तीव्र विकास जरूरी होता है। इस पुस्तक की किरदार एक ऐसी स्त्री है जो अपने संस्कारों में आधुनिकता का मिश्रण भी चाहती है और उसे स्वीकार्य योग्य भी बनाना चाहती है, पर हर बार की तरह उन्हें ऊंचाइयों को छूने से पहले उनके हौसलों को तोड़ने का प्रयास किया जाता है, जो कुंठित समाज और विचारधारा को प्रदर्शित करता है। इस पुस्तक में महिला सशक्तिकरण की वो तमाम वाद विवाद, पक्ष विपक्ष, चुनौतियों का जवाब है जिसे आप सभी को पढ़ना चाहिए। बहुत ही ऊर्जावान और अकादमिक भाषा का प्रयोग किया गया है, जिसे पढ़कर निश्चित तौर पर सुखद अनुभूति होती है या यूं कहे पैसा वसूल वाली अनुभूति होती है। इसे वर्तमान समय में जरूर पढ़ना चाहिए, आप सभी पढ़ें बहुत अच्छा लगेगा।
बहुत बहुत शुभकामनाएं मैम, इतनी शानदार समझ के साथ इस पुस्तक को लिखने के लिए। बहुत बहुत धन्यवाद
लिंक पर जाकर मैम की पुस्तक को पा सकते है
किताबें,कुछ तो कहना चाहती हैं,
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
किताबों में चिड़िया चहचहाती है
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं।
*सफदर हाशमी
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